ऐ ज़िन्दगी बता तू मुझसे क्या चाह रही है ?

ऐ  ज़िन्दगी बता तू मुझसे क्या चाह रही है ? ना सिमट रही है ना बिखर रही है ना संभल रही है ना लड़खड़ा रही है आखिर तू मुझसे क्या चाह रही है?   हर सुबह वही सूरज चढ़ता है, बिना किसी आहट आँगन रोशन कर छिप अपने घर लौट जाता है शामों पर शामें…

चेहरा है या नक़ाब?

चेहरा है या नक़ाब ? चेहरों पर ना जाने कितने चेहरे लगा कर घूमते हैं लोग हर दिन एक नया रंग दिखता है यूँ तो सामने बहुत मुस्कुरा कर मिलते हैं लोग पीठ पीछे ना जाने क्या कुछ चलता है कहने को तो बहुत से अपने मिल जाते हैं भीड़ में भीड़ से हट कर…

वो बचपन कितना सुहाना था

वो बचपन कितना सुहाना था हर जगह खुशियों का खजाना था ना एग्जाम्स की टेंशन, ना फ्यूचर की परवाह क्या मजेदार ज़माना था फिर अचानक से आ गई ये जवानी बिना किसी दस्तक के और ख्वाहिशों का दायरा बढ़ता गया बिना किसी वार्निंग के कहाँ पहले एक चॉकलेट और वो एक खिलौना मुँह पर इतनी…