आखिर ज़िन्दगी ही तो है, संभल ही जाएगी।

रास्ता सीधा तो नही, पर घर जाएगी

आखिर ज़िन्दगी ही तो है, संभल ही जाएगी।

 

राहे-मज़िल में मुश्किलें कम तो ना आएगी

हर पल, हर दिन, बहुत कुछ सिखाएगी

 

कभी इस डगर, कभी उस डगर,

कभी इस गली, कभी उस गली भी भटकाएगी

 

कभी अजनबियों से टकराएगी,

कभी नए दोस्त बनाएगी

 

कभी राह चलते दिल लगवाएगी,

कभी उन्ही राहों में तन्हा भी छोड़ जाएगी।

 

कभी बन कोयल कानों को सहलाएगी,

कभी बन गिरगिट बहुत से रंग दिखाएगी।

 

कभी आसमान की ऊंचाइयों पर चढ़ाएगी,

कभी धम से ज़मीन पर गिराएगी।

 

कभी खुशियों से दुनिया महकाएगी,

कभी ग़मों की आंधी भी ले आएगी।

 

कभी पलकों पर रेत के सपने सी बिछ जाएगी,

कभी काँच सी टूट कर पैरों में चुभ जाएगी।

 

कभी लड़खड़ाएगी, कभी डगमगाएगी,

सो बार गिराएगी, तभी तो उठना सिखाएगी।

 

टूटती हुई उम्मीदों से मजबूत बनाएगी,

ऐसे ही तो सपनों को पँख लगा उड़ना सिखाएगी।

 

ऐसे ही तो जीना सिखाएगी…

आखिर ज़िन्दगी ही तो है, संभल ही जाएगी।

4 Replies to “आखिर ज़िन्दगी ही तो है, संभल ही जाएगी।”

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