सुकून का सफरनामा, बड़ी-बड़ी इमारतें-एक छोटा सा घर

सुकून ढूंढ़ने निकली घर से , दिल में उम्मीद लिए और जेब में कुछ रूपए लिए।

बहुत से बड़े-बड़े शहर देखे, बड़ी-बड़ी इमारतों में भी रही।

बदलते मौसम देखे, बदलते लोग देखे,

समय गवाया और खुद को हताश पाया।

लोगों के आशियानें तो ऊँचे थे, दिखावे उससे भी ऊँचे थे,

बहुत पैसे तो थे पर दिल वीरान थे।

एक दिन यूँ ही चलते-चलते पहुंच गयी एक छोटे, पुराने से मकान में

जहाँ बहुत सारे लोग और अनाथ बच्चे थे।

फ़ीकी सी दीवारें थी, ना कोई रंग था, ना विलास था,

फिर भी वो मकान एक घर था।

कहने को वहाँ सब बेगाने थे, पर आपस में जैसे एक बड़ा परिवार था।

जेबें उनकी खाली थी और खाने को बस दो वक़्त की रोटी थी,

पर देने को उनके पास दुनिया भर का प्यार था।

हर किसी की अपनी दर्द भरी कहानी थी, दिल पे ज़ख्म सबके गहरे थे,

लेकिन चेहरे पर सबके मुस्कान थी और छुपे कुछ सपने थे।

सो बार गिर कर भी वो उठे थे, आगे बढ़ रहे थे,

क्या कहूँ तुझसे ऐ ज़िन्दगी, उनके हौसले तो तुझसे भी बड़े थे।

अपना तो नहीं था वहाँ कोई मेरा,

पर हर एक में वो अपनापन सा था।

सुकून ना उन बड़े शहरों की इमारतों में था, ना ही उनके बाज़ारों में था।

सुकून तो उन अमीरों के छोटे से उस गरीब-खाने में था।

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