वो बचपन कितना सुहाना था

हर जगह खुशियों का खजाना था

ना एग्जाम्स की टेंशन, ना फ्यूचर की परवाह

क्या मजेदार ज़माना था

फिर अचानक से आ गई ये जवानी बिना किसी दस्तक के

और ख्वाहिशों का दायरा बढ़ता गया बिना किसी वार्निंग के

कहाँ पहले एक चॉकलेट और वो एक खिलौना मुँह पर इतनी बड़ी स्माइल ला देते थे

और आज लोगों के दिलों से खेल जाते है पता ही नहीं चलता

दुनिया की ऐसी दोड़ पे निकल गए है खुशियाँ जैसे एक बक्से मे बंद करके

और वो ख्वाहिशों के बोझ को सर पर लटका कर

बस उन्ही ख्वाहिशों के पीछे भागते भागते आधी जवानी ख़राब करते रहे

बाकी जो बची वो प्यार के हवाले दी

बस फिर शमा की तरह पिघलते रहे, पतंगे की तरह जलते रहे

कुछ सालों बाद जाकर होश आया की हम तो बस प्यार के नाम पर अपना कटवा रहे थे

फिर जाकर होश संभाला तो मालूम हुआ की ज़िन्दगी दौड़ में तो साला बहुत पीछे रह गए

फिर भागे, पर इस बार दिल को संभाल कर भागे, बहुत ही जोश के साथ भागे

पैसा तो बहुत कमा लिया पर उसके चक्कर में जवानी और खुशियाँ गवा दी

अब याद आते हैं वो बचपन के दिन तो आँखें भर आती हैं

ज़िन्दगी की उस दौड़ में आगे निकल तो गए, पर वो खुशियों का बक्सा वही भूल आए|

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