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वक्त के गहरे सन्नाटे | Directionless Poetry - Directionless Poetry

वक्त के ये गहरे सन्नाटे आखिर कहना क्या चाहते हैं ?

वक्त के गहरे सन्नाटे मन के कमरे में एक कोने पर बैठ

बेसब्री से हर पल, हर दिन इंतज़ार करते हैं।

मन में लाख सवाल चलते हैं…

ये गहरे सन्नाटे लाखों सवाल अपने अंदर समेटे रोज़ दस्तक देते हैं ।

ये मन जो दुनिया के जंजालों में फस हर पल बेसब्र सा रहता है।

अपने अंदर समेटे इन गहरे सन्नाटों को बस नज़रअंदाज़ कर देता है।

बंद खिड़कियों से निरंतक झांकते हैं ये गहरे सन्नाटे।

बाहर न जाने कितना कुछ तराशता है ये मन…

पर ये मन कभी खुद को पढ़ता ही नहीं।

बाहरी लज़्ज़तों से फुरसत निकाल कभी इन गहरे सन्नाटों की आहट को भी सुनना।

ये गहरे सन्नाटे मुस्कुराहटों और ग़मों के मौसम से परे हैं।

ये आसमान से ऊँचे और समंदर से गहरे हैं।

कभी गौर करना ये कितने बेचैन से रहते हैं…

हल-ऐ-दिल ब्यान करवाने के लिए…

राह-ऐ-खुदा उस मंज़िल को पाने के लिए।

कितने बेचैन रहते है खुद को खुदी से वाक़िफकार करवाने के लिए।