माँ

कितनी प्यारी  शख्सियत बनाई है खुदा ने, माँ |

जिसका मुक़ाबला ना आज तक कोई कर पाया |

जिसने अपनी नींद क़ुर्बान कर मुझे रात भर गोद में झुलाया,

खुद गीले बिस्तर पर सौ कर मुझे सूखे पर सुलाया |

जिसने सर्द रातों में आँसुओं की झड़ी में बुखार से तपता मेरा माथा सेहराया |

जिसने रोते को हसाया, खुद का मन मार, मुझे बचपन का हर इक खिलौना दिलवाया ।

जब छोड़ तेरा आँचल निकली घर से मैं एक नए अनजाने से शहर में तब जाकर समझ आया,

मैंने तुझे कितना सताया माँ।

मैं वो छोटी सी नादान सी बच्ची ही ठीक थी, इस भीड़ ने मुझे कितना बड़ा बना दिया।

कहती तो नहीं तुझसे पर तू याद बहुत आती है माँ |

वो मेरा घंटों बिस्तर में अंगड़ाइयाँ लेना और तेरा कभी प्यार से, कभी डाँट कर मुझे जगाना…

अब जब तेरी आवाज़ की जगह वो अलार्म की घंटी रोज सुबह जगाती है , तब तेरा वो चिल्लाना बहुत याद आता है।

वो तेरा हाथ पकड़ कर घर से निकलना, बेपरवाह तेरे सहारे सड़क पार करना…

अब जब अकेली घर से निकल, दोनों तरफ देख कर सड़क पार करती हूँ तो तेरा हाथ बहुत याद आता है।

वो गलती करने पर भी बिना माफ़ी के तेरा माफ़ कर देना …

अब जब एक छोटी सी गलती के लिए भी ऑफिस में सॉरी बोलती हूँ, तब तेरी डाँट भी अच्छी लगती है।

वो बचपन में रात को डर कर भाग कर तेरे साथ छुप कर सो जाना…

अब जब रात भर जाग इन खाली दीवारों की तरफ झाँकती हूँ, तब तेरा आँचल बहुत याद आता है।

कितना प्यार दिया, कितना लाड़ किया, तेरी हर इक उस डाँट ने मुझे कितना समझदार बनाया।

मैं तो खो ही जाती इस भीड़ में अगर तूने हिम्मत से, बहादुरी से आगे बढ़ना ना सिखाया होता।

तेरे इस प्यार को कैसे ब्यान करुँ?

मेरे लिए की गई तेरी कुर्बानियों का ना मेरे पास कोई हिसाब है और ना ही अलफ़ाज़ हैं माँ |

8 Replies to “कितनी प्यारी शख्सियत बनाई है खुदा ने, माँ।”

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