करोड़ों को पन्हा देता है पर खुद तन्हा है

क्या तन्हा, अजीब सा ये जहान लगता है
ना दो गज ज़मीन, ना आसमान दिखता है।

ऊँची इमारतों से ऊँचे उठते सपने है
ठहरना कोई दो पल को भी कहाँ चाहता है।

एक बारिश सी हो रही है मानो ख्वाबों की
कुछ चाह कर भी भीग ना पाते है,
कुछ ना चाह कर भी भीग जाते है।

हर कोई डूबा हुआ नशे में लगता है
कुछ मंज़िल पाने के,
कुछ किसी को भुलाने के।

एक छाप छोड़ कर जाना चाहते है यहाँ सब
कुछ भीड़ में सट कर चलते हैं,
कुछ भीड़ से हट कर चलते हैं।

इस छोटे से शहर में जहाँ सैंकड़ों दिल धड़कते हैं
कुछ के सपने बनते हैं ,
कुछ के बिखरते हैं।

हर एक पल में ऐसे बढ़ता सा जाता है ये शहर
बिना एक सांस लिए दिन से रात हो जाती है,
एक पलक झपकते रात से दिन हो जाता है।

भाग सी रही है ये दुनिया
बीत ता हर एक लम्हा सा है
भीड़ में भी इस दुनिया की हर कोई तन्हा सा है।

4 Replies to “भीड़ में एक तन्हा सा शहर”

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