मुख़्तसर सा भी कहाँ मिला ये जहान मुस्कुराने को

सफरनामा बहुत लम्बा था, पहुंचना फलक तक था

और चलना भी तन्हा था

रास्ते ने मोड़ लिया कुछ ऐसा

मिल गया हमको भी एक साथी अपने जैसा

कदम से कदम मिले, हाथों में हाथ हम चले

और ना जाने कब दिल से दिल मिले

कुछ ही दूर पहुंचे, ज़िन्दगी ने ली ऐसी करवट

रास्ते जुदा हुए

मिले थे आखरी दफा उस मोड़ पर रुके

जुबाँ तो कुछ कह ना पाई

आँखें बहुत कुछ कहना चाहती थी,

पर हम शायद समझना ना चाहते थे

चल दिए अपने रास्तों पर,

ना मुड़ कर देखा उन्होनें, ना हमने

पर मुकम्मल ही ना हो पाए दिल वहीं ठहर गया।

काश उन्हें रोक लिया होता या काश खुद रुक गए होते।

काश उन्हें मोड़ लिया होता या खुद मुड़ गए होते

काश समझ ली होती उन बहती आँखों की ज़ुबानी

मंज़िल तो मिल गयी पर हमसफर रस्ते में ही खो दिया

फलक तक पहुंच तो गए, लेकिन वो भी उन बिन अधूरा सा मिला।

4 Replies to “फलक: एक अधूरी सी मंज़िल”

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