नाम: असिफा; उम्र: आठ साल; मज़हब: मुस्लिम; मौत का कारण?

छोटी सी थी मैं, महज आठ साल की।
अम्मी के चेहरे की मुस्कान और अब्बू की जान थी।
रोज़ की तरह सुबह हुई,
रोज़ की तरह चेहरे पर मुस्कान लिए अंगड़ाइयाँ लेते बिस्तर से उठी थी।
तैयार होकर, अम्मी से गले लग कर बकरियाँ चराने जंगल को जा रही थी।
पीछे से अब्बू ने रोज़ की तरह आवाज़ लगाई, असिफा…
मेरे पैरों में चप्पल ठीक से पहनाई थी।
मैंने हर रोज़ की तरह दाएँ पाँव की चप्पल बाएँ में और बाएँ की दाएँ में पहनी थी।
बीच जंगल में, बीच बकरियों के मैं खड़ी थी।
वो इंसान था या हैवान था?
अच्छे-बुरे की परख भी तो नहीं थी।
भागी थी में बहुत तेज, बहुत तेज जान बचाकर अपनी।
पर कितना ही भागती?
आखिर छोटी सी ही तो थी।
जब होश आया, आँखें खुली तो अँधेरे बंद कमरे में पड़ी थी।
अम्मी, अब्बू, अम्मी, अब्बू…
बचाओ मुझे, ना जाने कितनी बार पुकारा…
पर मेरी एक पुकार ना उन तक पहुंची थी।
ये बात इस दुनिया को कैसे बताऊँ , कैसे समझाऊँ?
मैं उन समाज और देश के रक्षकों के बीच पड़ी थी।
देखने को तो इंसानों की ही शकल थी…
पर उनमें इंसानियत ज़रा भी नहीं थी।
जिस मंदिर में रोज़ देवी की आरती करते हैं,
उसी मंदिर में मैं एक जिन्दा लाश बन पड़ी थी।
जिन मज़हबो का ना धर्म पता मुझे,
ना जिनके बीच का भेद पता मुझे…
चिल्लाती तो रह गई मैं ना ही देवी ने और ना ही अल्लाह ने एक सुनी थी।
जिस इज्ज़त का ना मतलब पता था मुझे…
वो देवी के उस मंदिर में ना जाने कितनी बार लूटी गई थी।
दर्द बहुत हुआ था इस रूह को मेरी…
चाह कर भी एक आह तक ना कर सकी थी।
उन दरिंदों की हवस का शिकार बन…
उस खुले जंगल में ना सिर्फ मेरी,
इस देश के कानून और इंसानियत की लाश पड़ी थी।

4 Replies to “नाम: असिफा; छोटी सी थी मैं, महज आठ साल की…”

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