चेहरा है या नक़ाब ?

चेहरों पर ना जाने कितने चेहरे लगा कर घूमते हैं लोग

हर दिन एक नया रंग दिखता है

यूँ तो सामने बहुत मुस्कुरा कर मिलते हैं लोग

पीठ पीछे ना जाने क्या कुछ चलता है

कहने को तो बहुत से अपने मिल जाते हैं भीड़ में

भीड़ से हट कर कोई साथ चलने को भी कहाँ मिलता है

कितने ही रंग कुदरत बदलती है

ये हक़ भी उससे इंसान छीन लेगा ये तो खुद कुदरत

ने भी ना सोचा होगा

इंसान ही इंसान के खून का प्यासा होगा

इस दिन का तो बस जिक्र ही सुना था

बढ़ती उम्र के साथ तुजुर्बा भी कमा लिया

बचपन में जिन नक़ाबों से डरते थे

आज वही नक़ाब इन चेहरों से बेहतर लगते है

 

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वो बचपन कितना सुहाना था

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