कलम ने लिखी पहचान की लकीरें।

दिल में ख्वाहिशें लिए, आँखों में कुछ सपने लिए,

जेब खाली लिए, निकले थे घर से पीठ पर जिम्मेवारियों का बस्ता टाँगे…

मुक्कमल होने इस मुकाबलों के जहान में।

सोचा था कुछ लम्हे तो चुरा ही लेंगे खुद की पहचान में।

ना जाने क्या, पर कुछ पाने की चाहत में,

बहते रहे ज़िन्दगी की रफ्तार में।

आँखों पर पट्टी बाँधे, अँधेरे में मशाल लिए,

शायद हथेलियों में गोंदी लकीरों को लम्बा करने की फ़िराक में।

अपने गुरूर पर सवार हुए…

एक रोज़ जब खुद से नज़रें ही ना मिला पाए उस पुराने आईने में।

खाते रहे थे हम तो धोखे इन बेग़ैरतों के जहान में।

खुद से मिलने की, खुदी की पहचान में,

पहुँच गए ऐसे मुकाम पर…

छूट गया सब कुछ इस कलम का साथ निभाने में।

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